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श्रीराम मंदिर (मोर क्षेत्र) श्री आनंदम में प्रख्यात कथाव्यास आचार्य नीरज शौनक के पावन सानिध्य में पुरुषोत्तम मास के उपलक्ष्य में श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के विश्राम दिवस पर वेद स्तुति, नवयोगेश्वर संवाद, परीक्षित मोक्ष के प्रसंग हुए

श्रीराम मंदिर (मोर क्षेत्र) श्री आनंदम में प्रख्यात कथाव्यास आचार्य नीरज शौनक के पावन सानिध्य में पुरुषोत्तम मास के उपलक्ष्य में श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के विश्राम दिवस पर वेद स्तुति, नवयोगेश्वर संवाद, परीक्षित मोक्ष के प्रसंग हुए

भक्तों ने आरती कर उपहार दिए, आचार्यपीठ से भक्तगणों ने तन, मन, धन से महती भूमिका निभाई व्यासपीठ से कथा में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सहयोगियों का सम्मान किया

नवलगढ़ न्यूज - आचार्य श्री ने भागवत कथा के विश्राम को केवल ज्ञान यज्ञ भक्ति भावस्वरूप अनुष्ठान का समापन नहीं कहा, बल्कि इस कथा से मिले ज्ञान संस्कार भक्ति को अपने नित्य जीवन में उतारने का संकल्प है, तथा कथा श्रवण करने मात्र से जन्म-जन्मांतर के विकार नष्ट होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
सुदामा चरित्र का कराया श्रवण अंतिम दिवस पर सच्चे प्रेम व त्याग के प्रतीक सुदामा कृष्ण की मित्रता के प्रसंग सुनाये गए।
सुदामा केवल ब्राह्मण नहीं वरन ब्राह्मणों में सर्वश्रेष्ठ का चिंतन करने वाले, इंद्रियों से विरक्त, इंद्रियों को नियंत्रण में, मोह नहीं भगवान का भजन करने में निपुण कथा व्यास ने बताया दरिद्र वही जिसकी तृष्णाएं पूरी नहीं होती।
मित्रता को बताया त्याग का पर्याय कहा कि सुदामा दरिद्र न होकर, बल्कि त्याग के पर्याय थे। सुदामा की दरिद्रता के पीछे उनका महान त्याग ही मुख्य कारण था। आचार्य वर्तमान समय के मित्रों को भी कृष्ण और सुदामा की मित्रता से प्रेरणा लेने की सीख दी, जिसका प्रतिफल भगवान कृष्ण ने मुट्ठी भर चावल खाकर उन्हें लोक प्रदान कर दिया। सुदामा चरित्र में सुदामा अभावों में भी प्रसन्न रहते थे। कथा के दौरान व्यासपीठ से प्रसंग के अनुसार सुमधुर कर्णप्रिय कीर्तन और भजनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध किया। कथा के पूर्व कथाव्यास का पुस्पवर्षा से कथा पंडाल प्रवेश करवाया।
 यह ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का महान ग्रन्थ है। इसके श्रवण से भोग और मोक्ष तो सुलभ हो ही जाते हैं, वरन कहाँ तक कहें भगवान के चरणकमलों की अविचल भक्ति भी सहज प्राप्त हो जाती है। मन की शुद्धि के लिए इससे बड़ा कोई अन्य साधन नहीं है, वैसे ही भागवत श्रवण से कलियुग के समस्त दोष नष्ट हो जाते हैं श्रवण मात्र से श्री हरि भक्ति साथ हृदय में आ विराजते हैं।
कथा में वेद स्तुति में बताया यह भागवत वेद रूपी कल्पवृक्ष का मधुर पके हुए फल के समान है। सभी वेद वेदांग, पुराण, उपनिषद, धर्म शास्त्रों का निष्कर्ष सार इसी में निहित है। भागवत कथा में वेदों की स्तुति हमें यह ज्ञान देती है कि सम्पूर्ण जगत ईश्वर में ही व्याप्त है और ईश्वर ही समस्त जीवों का अंतिम लक्ष्य हैं। ईश्वर अविनाशी, परम चैतन्य और आनंद के सागर हैं। भागवत कथा ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का त्रिवेणी संगम है।
कथा में नवयोगेश्वर संवाद का श्रवण करवाया जिसे ज्ञान और भक्ति का अद्भुत मिश्रण बताया जिसमें राजा निमि और भगवान ऋषभदेव के नौ ज्ञानी पुत्रों (योगेश्वरों) के बीच आध्यात्मिक चर्चा, जिसमें भागवत धर्म, माया के स्वरूप और ईश्वर प्राप्ति के रहस्यों को समझाया गया। नवयोगेश्वरों द्वारा नौ उपदेश -भागवत धर्म का रहस्य, माया के स्वरूप व माया से बचने के उपाय, भक्ति मार्ग, कर्म योग, यज्ञ और ईश्वर की उपासना, भगवान के अवतारों की लीला, भागवत प्राप्ति के सोपान, ज्ञानपूर्ण चर्चा को सुनकर राजा निमि के सभी संशय दूर हो गए, सांसारिक बंधनों में रहते हुए भी, यदि मन में ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति ज्ञान हो तो सरलता से जीव मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
अन्तिम दिवस की कथा में राजा परीक्षित की कथा का समापन होकर यह संदेश दिया कि ईश्वर की शरण और सच्ची हरि-भक्ति से मृत्यु से मुक्ति है, शुकदेवजी द्वारा सात दिनों की कथाओं में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं, भक्ति और ज्ञान का विस्तृत वर्णन किया कथा से परीक्षितजी पूर्ण रूप से वैराग्य और ईश्वर भक्ति में लीन हो गए, सातवें दिन जब तक्षक नाग परीक्षित को डसने के लिए आया, तब तक वे ज्ञान और भगवन्नाम के प्रभाव से इतने शुद्ध हो चुके थे कि उन्हें मृत्यु का कोई भय नहीं रहा। तक्षक के डसने के तुरंत बाद उनका भौतिक शरीर समाप्त हो गया और उन्हें साक्षात वैकुंठ धाम (मोक्ष) की प्राप्ति हुई यह कथा दर्शाती है कि सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर हरि स्मरण किया जाए, तो मनुष्य भवसागर से पार हो सकता है।
पधारे संतवृंद बिक्रमनाथजी पालवास धाम, मुक्तिनाथजी मीरण धाम, महेंद्रदासजी परसरामपुरा का अंगवस्त्र, श्रीफल प्रतीक चिन्ह भेंट कर सम्मान किया गया। इसी के साथ का स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मान किया गया।
डा. गौरव कुलवाल, डा. ऋचा कुलवाल, बजरंगलाल कुलवाल, शारदा कुलवाल, नारायण रेकी परिवार से कृष्णा मुरारका स्मृति चिन्ह प्रदान कर दुपट्टा उड़ाकर सम्मान किया।
कथा के विश्राम पर महाआरती का आयोजन किया गया व महाप्रसाद का भी वितरण किया।